पलामू में अनुसंधान की गुणवत्ता पर एसपी सख्त, 120 पुलिस पदाधिकारियों को दिए निर्देश; लंबित 2250 कांडों की संख्या घटाकर करीब 1000 करने का दावा
मेदिनीनगर (पलामू)।
प्राथमिकी दर्ज करना, अनुसंधान शुरू करना और 60 से 90 दिनों के भीतर आरोप-पत्र (चार्जशीट) दाखिल कर देना ही पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है। पुलिस का वास्तविक दायित्व अपराध की सभी कड़ियों को जोड़कर सच्चाई सामने लाना और दोषियों को सजा दिलाने योग्य ठोस साक्ष्य जुटाना है। प्राथमिकी में दर्ज बयानों को कॉपी-पेस्ट कर अनुसंधान पूरा करना पूरी तरह गलत है। यह स्पष्ट संदेश पलामू के पुलिस अधीक्षक कपिल चौधरी ने गुरुवार को पुलिस पदाधिकारियों को दिया।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मृति हॉल में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 के प्रावधानों पर आयोजित एक दिवसीय प्रशिक्षण एवं ओरिएंटेशन कार्यशाला में एसपी ने अनुसंधान की गुणवत्ता पर विशेष जोर दिया। जिले के 120 चयनित पुलिस पदाधिकारियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि प्राथमिकी केवल घटना की सूचना है। अनुसंधानकर्ता को यह पता लगाना चाहिए कि घटना कब और कैसे हुई, उसे किसने अंजाम दिया और उसके पीछे क्या कारण था।
एसपी ने स्पष्ट किया कि अनुसंधानकर्ता किसी आरोपी के बयान को ही जांच का आधार बनाकर न चलें। प्रत्येक निष्कर्ष तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित होना चाहिए। पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने की स्थिति में मनगढ़ंत या कमजोर अनुसंधान के सहारे मामले को आगे बढ़ाना उचित नहीं है। उन्होंने अनुसंधान के दौरान वरीय अधिकारियों से राय-मशविरा नहीं करने की प्रवृत्ति पर भी नाराजगी जताई और जरूरत पड़ने पर उनसे मार्गदर्शन लेने का निर्देश दिया।
दो माह में लंबित कांडों के निष्पादन का लक्ष्य
एसपी कपिल चौधरी के अनुसार, जिले के विभिन्न थानों में लंबित करीब 2250 कांडों की संख्या घटाकर लगभग एक हजार तक लाई गई है। शेष लंबित मामलों को अगले दो माह में निष्पादित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। उन्होंने नए मामलों का भी निर्धारित 60 से 90 दिनों के भीतर निष्पादन करने पर जोर दिया। चार्जशीट दाखिल करने में अनावश्यक देरी करने वाले पुलिस पदाधिकारियों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की चेतावनी भी दी।
उन्होंने अनावश्यक मामलों को न्यायालय भेजने से बचने का निर्देश देते हुए कहा कि अनुसंधान तथ्यों और कानून के अनुरूप होना चाहिए, ताकि अदालतों पर बेवजह मुकदमों का बोझ नहीं बढ़े और वास्तविक मामलों में न्याय की प्रक्रिया मजबूत हो सके।
ई-साक्ष्य और फॉरेंसिक जांच पर दिया गया प्रशिक्षण
कार्यशाला में बीएनएसएस के तहत प्राथमिकी दर्ज करने, गिरफ्तारी, तलाशी एवं जब्ती, ई-साक्ष्य, फॉरेंसिक जांच, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के संकलन और संरक्षण तथा आरोप-पत्र दाखिल करने की प्रक्रिया की जानकारी दी गई। एसपी ने पुलिस पदाधिकारियों को वैज्ञानिक, पारदर्शी और समयबद्ध अनुसंधान सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।
उन्होंने कहा कि अनुसंधान का उद्देश्य केवल कागजी कार्रवाई पूरी करना नहीं, बल्कि पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए मजबूत साक्ष्य जुटाना होना चाहिए। कार्यशाला में जिले के सभी एसडीपीओ, थाना प्रभारी और विभिन्न कांडों में नियुक्त अनुसंधानकर्ता (आईओ) शामिल हुए।






